मन क्या हैं ?मन पर काबू रखना सीखो, सब कुछ पालोगे | जानिए मन क्या है ,कैसे करे इसको अपने काबू में :
ये जो मन है ना ये भगवान ने इसकी रचना की है। इंद्रियाणाम मनः शासमी कह रहे इंद्रियों में मैं मन हूँ। और त्रिगुण माया का इसमें भरा हुआ पूरा पॉइजन जहर है। अब देखो मन छोड़ के गंदी बात में जाएगा। ये नहीं कि अच्छी बात में नहीं जाता। अच्छी बात में लगाओ तो लगेगा और वो भी थोड़ी देर। और बुरी बात में लगाने की जरूरत नहीं। आराम से उसका स्वभाव रचना ऐसी रची गई है। अब यही गेम रखा गया है कि अब इसकी गति को रोको, अंतर्मुख करो, भगवदाकाल करो तो तुम्हें इनाम मिलेगा। त्रिभुवन पर विजय प्राप्त कर लोगे। वो अद्भुत आनंद अंदर ही मिलेगा। किसी से कहने की जरूरत नहीं आनंदमग्न हो जाओगे। और उसी आनंद की खोज देखो जब हमारा मन कहता है इस शरीर को भोग ले, इस वस्तु को भोग ले, अमुक देखो सब अपने घर के जैसे बैठे हैं। क्या उसके भोगने के बाद मन को शांति मिलती है? थोड़ी देर के बाद फिर एक नया संकल्प बनता है। फिर एक नई मतलब हमारी खोज अधूरी रही। वो नहीं मिला जो मैं सोच रहा था। सोचने में जैसा सुख मिलता है वैसा ना भोगने में नहीं मिलता। चाहे वो भोजन हो, चाहे वो दृश्य हो, चाहे वो कोई क्रिया हो। आप देखना जो मन हमें सोचवा के पागल बनाता है और जब हम उस पे जाते हैं तो वो चीज हमें नहीं मिलती है। तब लगता है कि वो यहां नहीं शायद यहां हो, यहां नहीं शायद यहां हो। ऐसे भटकते पूरा जीवन व्यतीत हो जाता है।
मन का खेल :-
बुद्धिमान वो है जो दो चार कदम में ही लौट के आ गए कि गलत दिशा समझा है। पर हम पूरा जीवन चलते रहते हैं। लौटने की बात ही नहीं आती और यहां तक कि शरीर वृद्ध हो जाता है, इंद्रियां काम नहीं करती पर मन वैसे ही सलाह करता रहता है। फिर भी नहीं सोच पाता कि चलो अब हुआ पूरा जीवन किस काम अब तो राधा राधा जप कर अपना काम बना लें। लेकिन नहीं बूढ़ा है फिर भी शराब पीता है। बूढ़ा है फिर भी गंदी बातें देखता है। बूढ़ा है फिर भी गंदी चेष्टाएं करता है। बूढ़ा है फिर भी नहीं सोच रहा कि मुझे मरना है और भगवत प्राप्ति का अब की बार कर लूं इतना जीवन ले गया। ये क्या है ये मन का केवल खेल है। वो अपने मन के गेम में फंस गया, निकल नहीं पा रहा। अच्छा इसमें ये हो कि चलो मन सुखी रहेगा तो भी नहीं। आप जितना गलत करते जाओगे उतना वो नकारात्मक सोचें पैदा करता चला जाएगा और उसका परिणाम ये आएगा कि आपको डिप्रेशन में पहुंचा देगा। मतलब किसी भी तरह से इस चैन नहीं लेने देगा। तो इसको लाना तो भगवान के शरण में पड़ेगा। तभी शांति मिलेगी, तभी सुख बहुत गंदा, बहुत गंदा बहुत नीच है और ये बहुत उत्तम है।
मन उत्तम कैसे है :-
ये अगर सही रास्ते को पा जाए तो दूसरे के लिए अपने प्राण दे सकता है। परहित के लिए अपने प्राण दे सकता है। ये भगवान से मिला सकता है। ये सब सुख दे सकता है। बस इसको गलत ढंग से जो प्रयोग होना शुरू हुआ है इसका ये बंद कर दो वही बात हो गई। देखो विरक्त मार्ग एक अलग होता है लेकिन गृहस्थी में तो एक धर्मपूर्वक विषय सेवन की मर्यादा है ना तो आप धर्मपूर्वक देख लो। अगर आपको अपनी पत्नी में अपने पति में सुख नहीं मिला तो विश्व में कहीं सुख नहीं मिलेगा क्योंकि है नहीं। तो आपको सीमित हो जाना चाहिए ना लेकिन ऐसा नहीं होता। हम धर्म विरुद्ध बढ़ते चले जाते हैं। जो हमारा पाप बनता जाता है और हम क्लेशित होते जाते हैं। इसलिए हमें लगता है बहुत अच्छे हैं। अभी सत्संग के प्रभाव पढ़ रहे हैं तो हम निकल चले गंदी बातों से। हम निकल चले इस माया के फसाव से नहीं तो धोखा ही धोखा पूरी जिंदगी व्यतीत हो जाती है। भोगते भोगते हर इंद्रियां सब नष्ट होती जा रही है। फिर भी भोग इच्छा ये है क्या समझो ना। पूरा जीवन हमको बेवकूफ बनाया जा रहा है। गौर से देखो पूरा जीवन हमें बेवकूफ बनाया जा रहा है। और एक बार और देख लेते हैं इसमें हमारा पूरा जीवन जा रहा है। एक सुख तो नहीं मिला। एक बार ऐसे देखते हैं साहब इस पद्धति से देखते हैं। ऐसे भोजन बनाते हैं, ऐसे ये भोगते हैं, ऐसे ये देखते हैं। और ऐसा फंसाव करके रोज हमको गिराता है। रोज हमको भ्रष्ट करता है। कभी नहीं कहता कि एक बार भगवान से मिलूं क्या। कभी उसका मन नहीं होता। इसको तो जबरदस्ती लगाना पड़ता है। इसको भगवान में लगाने के लिए भी भोगों का प्रलोभन देना होता है। तभी भगवान में लगता है धीरे-धीरे। ये भोगी मन भगवान में भी लगने के लिए तैयार तो भोग के लिए। देखो भगवान को मना लोगे ना तो बढ़िया व्यवस्था बन जाएगी छक से जो चाहोगे सब हो जाएगा। जो चाहेंगे भगवान दे देंगे। बहुत मन बेवकूफ बनाता है इसलिए हमें लगता है मन की बेवकूफी से बचना चाहिए।
मन को वस् में कैसे करे :-
एक आया था भगतला उसने कहा भगवान से मैं भजन करूंगा सब करूंगा लेकिन 1 लाख सुंदरियां स्त्रियां चाहिए। अब गजब का दिल है तेरा गजब का दिल है यार। जिनके एक है ना वो कभी-कभी निकालते हैं ऐसे बैठ के बैठते हैं। तो इसीलिए मन की कहीं भी मत रखो। ये बहुत बड़ा भूत है। ये परेशान कर देगा, नष्ट कर देगा। इसे सत् मार्ग में लाओ, भगवत मार्ग में लाओ। तभी आनंद की इसकी केवल चाल है। ये नहीं ये ये नहीं ये वो है कहीं नहीं। पक्का समझ लीजिए। ये हमारे को भ्रम पैदा करता है। कुछ नहीं कुछ नहीं है। नाम जप करो, सत्संग करो, धर्मपूर्वक विषय भोगो। हम मना नहीं करते। एक उस सीमा में रख के भोगो धर्म में तो उससे क्या होगा तुम्हें घृणा हो जाएगी। धर्मपूर्वक विषय भोगने से घृणा हो जाती है क्या? और जो ये व्यसन करके और फिर इधर-उधर मन तो पाप के कारण बुद्धि ठीक निर्णय नहीं देती और बुढ़ापे तक पापाचरण फिर दुर्गति को प्राप्त होते हैं। अभी समय है अभी मन को समझा लो। मन को समझ यही पांच भोग है शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध। इसी में मनुष्य फंसा और इन्हीं भोगों से हमारी दुर्गति हो जाती है। बोलो अभी तक फाइनल में अगर बोला जाए तो अभी तक क्या है अपने पास कोई अनुभव है क्या? बस एक ही एक बार और चांस मिल जाए बस किसी भी विषय का मतलब किसी भी विषय का मन में हर बार यही होता है कि अबकी बार लेकिन कभी अबकी बार पूरी नहीं हुआ। तो इसको रोकना जरूरी है|
मन को सतकर्मो में कैसे लगाए :-
भजन साधन धर्मपूर्वक विषय सेवन और समाज की सेवा। ये कभी एक बार ऐसा करके देखना कोई बूढ़ा ऐसा भूखा प्यासा फुटपाथ में पड़ा हो और उसको कभी अपने घर लाना, नहलाना, धुलाना, कपड़े पहनाना और भोजन पवाना। फिर वो जब तुम्हारी तरफ देखेगा तो तुम्हें जो सुख होगा वो जिंदगी में किसी भी भोग में नहीं मिला होगा। आप लिख लेना हमारी बात कभी कोई बीमारी से तड़प रहा हो किसी के सेवा का वहां कोई अवसर नहीं है और आप सेवा का अवसर देकर उसे आप स्वस्थ करो, आप अस्पताल ले जाओ। फिर जो आपको सुख मिलेगा हम आपको कैसे बताएं वो भगवान का आशीर्वाद होता है। जब कोई बूढ़ा, कोई बीमार, कोई असहाय और जब आप उसकी सहायता करते हो तो उसके हृदय से जो आशीर्वाद वो सुख जो मिलता है जिसे हम आपको एक एक दिन करके देखना। तुम अपना भोजन बढ़िया जो है कोई ऐसे भूखे को खावा देना जो भूखा बैठा हो और वैसे जल्दी-जल्दी और आप देखो उसको पाते हुए और उस दिन आप वो भोजन ना पाओ उसे पवा दो तो आपको जो सुख मिलेगा वो 56 प्रकार के भोग पाने में भी कभी सुख नहीं मिला होगा। वो सुख परहित करने से दूसरे को सुख पहुंचाने से जो हृदय शीतल होता है वो कभी किसी से नहीं होता। इसलिए मानव जीवन के लिए मन को थोड़ा विरुद्ध जो चलने वाला है उसके विरुद्ध आप बनो। उसे सत् मार्ग में लगाओ।
मन ने बुद्धि को कैसे वस में किया जाने :-
अब देखो आजकल ऐसी बुद्धि बिगड़ गई है कि अपने पुत्र ही माता-पिता को ही बच्चे दुख दे रहे हैं। मां धुंधा थप्पड़ मारना। क्या है आज के जवान अपने माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं। अगर थोड़ा भी अध्यात्म से जुड़े होते तो मुझे लगता है शायद ऐसा नहीं करते। नहीं ना धर्म से जुड़े होते, अध्यात्म से जुड़े होते। ऐसे माता-पिता भगवान होते हैं। उनकी आंखें नहीं उनको नहलाओ, धुलाओ। किसी मंदिर जाने की और जरूरत नहीं। उनको भोग लगाओ, उनको पवाओ। उनका जो आशीर्वाद है लोक परलोक तुम्हारा सब बना देगा। लेकिन जब अध्यात्म से नहीं जुड़े तो लगता है कौन उनको। तो अब ये क्या है?
मन से जन्म-जन्मांतरों के पाप नष्ट कैसे करे :-
ये है मन का वो पापी मन देखो कैसे पाप कराता है, कैसे नेगेटिव चलाता है। या वैसे पुत्रों की क्या दुर्गति होगी? तो कभी अगर ऐसा ऐसा अवसर किसी को मिले कि कोई फुटपाथ में ऐसे तड़प रहा हो तो आपको जरूर लगेगा कि काहे को बोझा ले लेकिन आप उसका अगर बोझा ले ले तो भगवान तुम्हारा बोझा ले लेंगे। जन्म-जन्मांतरों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जब ऐसे दिन दुखी आशीर्वाद देते हैं ना उसे भगवान का आशीर्वाद समझना। और जब माता-पिता अंदर से शाप देते हैं ना कि भोगोगे तो फिर भगवान भी नहीं टाल पाते फिर भोगना पड़ता है। इसलिए धर्म से चलो, किसी का अपराध मत करो, गंदी बातों में मन को ना जाने दो, खूब नाम जप करो। यही मनुष्य जीवन का लाभ लो। मनुष्य जीवन एक दिव्य जीवन है। इसका एक दिव्यता का लाभ है।
मन पर निश्चय करें :-
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यार देखो अगर हम ना चाहें तो पूरी बाजार से निकल जाओ कोई सामान दुकान की आके हमारी लिपट थोड़ी जाती है। हम जहां खड़े होंगे, जहां खरीदेंगे वहीं से वो वस्तु हमें मिलेगी। तो अगर हम निश्चय कर लिया कि मुझे मांस नहीं खाना, मुझे शराब नहीं पीना, मुझे पराई माता बहनों की तरफ गंदी दृष्टि नहीं करनी तो मुझे कौन गिरा देगा? अब सोचो हमारी निश्चय में कमजोरी तभी हम डरते हैं कि कहीं गिर ना जाए ऐसे कैसे हो? हां कुछ कमियां ऐसी होती है जिससे अहंकार का नाश किया जाता है। जैसे आवाज आता है ना हम जीते इंद्री हम ऐसे हम ऐसे और भगवान को अहंकार पसंद नहीं। तो छोड़ देते हैं देखो जीते इंद्री त्याग करके तब जब रोता है कि प्रभु मैं तो नीच किसी काबिल नहीं तब भगवान फिर उठा लेते हैं। नाम जप करो तब मजबूत ब्रेक लग जाएगी। कोई कैसे गिरा सकता है?नहीं गिरा सकता बात मान ली तो हो गया, हो गया। बात मानने से होता है। देखो हमारी बात ना मानो कंठी बनवा लो, तिलक लगा लो, सब कर लो कल्याण नहीं होगा। और हमारी बात मान लो कल्याण हो जाएगा। बात मानने का चेला होता है। ये कोई संसारिक थोड़ी कि भैया देखो संसारिक संबंध होते हैं। गुरु शिष्य का संबंध आज्ञा पालन से होता है। गलत नहीं करूंगा जैसा कहोगे वैसा चलूंगा। अब आपने कह दिया अब ये नाम जप करूंगा बस हो गई बात। बात ये है कि हमको अब महत्व कर लेना है। अरे बोले ऐसे कह दिया था सीधा राम राम राम जपो तो गुरु मंत्र तो मिला नहीं। तो कभी गुरु मंत्र मिल भी जाएगा तो लाभ नहीं मिल पाएगा क्योंकि आपको संत वचन गुरु के वचन पर विश्वास ही नहीं हुआ। गुरु के वचन प्रतीत ना जेहिं। ये स्वप्न में भी लाभ नहीं मिलेगा। मान लिया हो गया हमारा सब कुछ। अब हम राम राम जप करेंगे, अच्छे आचरण से चलेंगे तो यही नाम आपको बल दे देगा।