आजकल लोग मंदिर भी जाते हैं और माँस-मदिरा भी खाते हैं उनका क्या होगा ?
मनुष्य जीवन केवल सांस लेना और भौतिक सुख पाना नहीं है, बल्कि यह आत्मिक उन्नति और भगवान की भक्ति के लिए है। लेकिन यह तभी संभव है जब हम सात्विक भोजन और संयमित आचरण अपनाते हैं। अन्यथा हमारा जीवन निरर्थक होकर पाप और दुख की ओर ले जाएगा।सात्विक भोजन और संयमित आचरण से ही मनुष्य जीवन सार्थक हो सकता है, अन्यथा निरर्थक।
आहार शुद्धि से मन शुद्धि
ऐसे होंगे कि जो भगवान का भजन भी मतलब मंदिर में जाएंगे और तामसिक भोजन का व्यवहार करेंगे। बिल्कुल नहीं बिल्कुल मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर जाएंगे मतलब इसे कुछ नहीं होने वाला ।सबसे पहली बात है हमारे आहार शुद्धि मन शुद्धि देहाती भाषा में कहते हैं जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन ।देखो अगर हम शास्त्र की आज्ञा का पालन नहीं करेंगे और मनमानी आचरण करेंगे तो नरक जाओगे। पहले आहार शुद्धि मन शुद्धि अगर जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन |
मंदिर और तामसिक भोजन: विरोधाभास
किसी भी प्राणी को दुख देना,हनुमान चालीसा का भी पाठ करते हैं ये अपनी वासनाओं के अपने जीविका को थोड़ा रोक या शराब पीते हो, मांस खाते हो ,अंडा खाते हो ,इस तरह के व्यवहार करते हो और हनुमान जी और शंकर जी ऐसे प्रसन्न हो जाएंगे ,ऐसे काम बन जाएगा। कुछ नहीं बन पायेगा ।”अवश्यमे भोगतव्यम कर्तम कर्म शुभाशुभम “जो तुम कर्म करोगे, तुम्हें भोगना पड़ेगा चाहे मुर्गा हो, चाहे बकरा हो ,सब जीव अपने प्राण बचाना चाहते हैं सब जीव। तुम उनको काटकर खाओगे वो भोगना पड़ेगा ।
पाप कर्म और उसका भोग
राम जी के रूप में भगवान ने यदि बाली के चरणों में बाण मारा तो भगवान श्री कृष्ण के चरण में व्याध के रूप में उसने बाण मारा ।देखो ना लीला देखो। भगवान ने अपनी लीला जो श्री कृष्ण ने लीला है वो यहां संपन्न की कि भगवान के चरणों में व्याध जो है बाण मार रहा है ।अब आप विचार करो जो वो सरकार समर्थ होते हुए भी अपने लीला का लीला दर्शन कराते हैं ।श्रवण कुमार के पद का संयोग बन गया दशरथ जी के हाथ से सब बेजी बाण मार दिया तो देखो उनका जो कर्म था। वो तड़प तड़प के अपने पुत्र भगवान राम के योग में प्राण त्यागना पड़ा कि नहीं पड़ा ।भगवान उसको मिटा सकते थे ,लेकिन भगवान नहीं मिटाते “अवश्यमे भोगतव्यम” गीता जी में कहा है इसलिए हमारी प्रार्थना है कि तमोगुणी भोजन का त्याग करो सात्विक भोजन और संयम से रहोगे तो तुम में जो बल आएगा वो एक महान पवित्र बल होगा। आज बल नहीं दिखाई देता चेहरे में कांति नहीं है। विचारों में पवित्रता नहीं है। ऐसा नहीं हम पशु नहीं हैं। हम मर्यादा से चलने के लिए हैं। हमारी मर्यादा बनाई गई शास्त्र मर्यादा हमारी कानून व्यवस्था है ।यदि हम शास्त्र मर्यादा से चलेंगे शास्त्र कानून से चलेंगे तो हमारा मनुष्य जीवन सार्थक हो जाएगा नहीं तो निरर्थक हो जाएगा ।
स्वतंत्रता बनाम मनमानी
जैसे आजकल बच्चे कहते हैं हम स्वतंत्र हैं, नहीं स्वतंत्रता नहीं ,माता-पिता की आज्ञा के परतंत्रता शास्त्र की आज्ञा के परतंत्रता गुरु की आज्ञा के परतंत्रता कानून की परतंत्रता अगर ये स्वीकार करोगे तो स्वतंत्र हो जाओगे। अगर मनमानी करोगे तो परतंत्र हो जाओगे मनमानी स्वतंत्रता नहीं होती ,मनमानी इंद्रियों की परतंत्रता होती है। जो इंद्रिय कहती है वही हम कहते हैं ।आप अपने को स्वतंत्र समझते हैं ,इंद्रियों के गुलाम मन के गुलाम तो स्वतंत्रता कहां है स्वतंत्रता तब होगी जब हमारी बात पुनः समझ ले शास्त्र आज्ञा के अधीन चलोगे गुरु के अधीन चलोगे संतों की वाणी के अधीन चलोगे भगवान शास्त्र और संतों के रूप में विराजमान है। तो आप स्वतंत्र हो जाओगे माया मुक्त हो जाओगे फिर आचरण और भोजन ये दो का बहुत बड़ा योग है। अगर हमारा भोजन ठीक तो हमारे आचरण ठीक होंगे हमारे आचरण ठीक तो हम भगवान को प्रसन्न कर सकते हैं।
बलि प्रथा: एक मूर्खता
“गंदा आचरण “अभी कल परसों एक प्रश्न आया था कि गांव रिहाट में महाराज जी क्या है कि छोटे-छोटे देवी जी के मंदिर हैं और गांव में किसी के घर में बच्चा हो रहा है या शादी हो रही है तो महाराज जी बकरा लेके और फिर उसका वो कहते हैं बलि देते हैं ,फिर महाराज जी फिर पूरे गांव वाले आते हैं,फिर पूरा मांस वो खाते हैं मंदिर भी जा रहे हैं महाराज जी देवी की आराधना भी कर रहे हैं ,उसके बाद य भोजन ये आशुनी मृत्यु है?
इससे भगवान प्रसन्नता नहीं होती हम सबको ये बताना चाहते हैं। जगदंबा को जगत जननी कहते हो तो बकरी की भी वो मां है ।जगत जननी है ना मां अपने पुत्र की बलि से प्रसन्न कैसे हो सकती है। हमें तो नहीं समझ में आता वो जब वो जगत जननी है तो बकरी की भी मां है वो भैंस की भी मां है वो गाय की भी मां है वो मां जो जगत माता है वो अपने पुत्रों की बलि से प्रसन्न कैसे हो सकती है ।अगर वो प्रसन्न होती तो तुम्हारा मंगल हो जाता किसका मंगल हुआ बकरी की बलि चढ़ाकर हमें बताओ ।वो तो महाकाली है महाकाल स्वरूप भी है। तो वो दुष्टों का संहार करने के लिए रूप माता जी ने धारण किया वो दुष्टों का खून पिया जो संसार के पवित्र जीवन जीने वालों के लिए वो मृत्यु काल रूप थे। जैसे महिषासुर शुंभ निशुंभ रक्तबीज माता जी ने इनका संहार किया इन बकरियों बकरों का थोड़ी संहार करने से माता जी प्रसन्न हो जाती है ।ये तो मूर्खता है कोड़ी मूर्खता है कभी माता जी प्रसन्न नहीं होती। हमें लगता है कभी ऐसे कार्य नहीं करने चाहिए और ये सोचो कि मां प्रसन्न हो जाएंगी मुझे ऐसा नहीं लगता | माता जी तो तब प्रसन्न होंगी जब सब पर दया करने लगो सबको सुख पहुंचाओ नाम जप करो ,अच्छे आचरण करो ,तो जगदंबा प्रसन्न हो जाएंगी अगर फिर से हमको प्रसन्न करना है | जैसे किसी के घर में पुत्र हो शास्त्र शास्त्र में शास्त्र में विधान है नारियल की बलि नींबू की बलि इन इनकी बलि सात्विक बलि दे | आप कच्चा नारियल की बलि दे सकते हैं तो ये भी बलि तो मानी जाती है ये सब मनमानी आचरण है इससे देवी प्रसन्न नहीं होती है और देवी को रक्त चाहिए तो चराचर जीवों के हृदय में देवी विराज”देवी प्रपन्ना अर्थे प्रसिद्ध प्रसिद्ध मात्र जगतो खिलस्य प्रसिद्ध विश्वेश्वरी पाय विष्णुम त्वमेश्वरी देवी चराचरस्य त्वमेश्वरी देवी चराचरस्य “वो चराचर की ईश्वरी है उनको किसी के खून की जरूरत नहीं है| मां को किसी के खून की जरूरत है अरे मां तो अपने खून को दूध बनाकर अपने बच्चों का पालन करती है| मां शब्द कितना महान है वो अपने शरीर के रक्त को दूध में परिवर्तित करके अपने बेटे का पालन करती है | वो दूसरों का रक्तपान कैसे कर सकती है ये दुष्टों के रक्तपान किए माता जी ने जो समाज के लिए कलंक थे | जो समाज का द्रोह करके समाज को नष्ट करने में लगे थे | ऐसे राक्षसों को माता जी ने मारा शुंभ निशुंभ रक्तबीज महिषासुर ऐसा ऐसे नहीं है कि गलत सिद्धांत से ना चले नहीं तो नरक की प्राप्ति होगी |
देवी-देवताओं की वास्तविक प्रसन्नता का मार्ग
महाराज जी आज जैसे आप कहते हैं कि भजन मार्ग अभी तामसिक भोजन भी हो रहा है, महाराज जी फिर हम वही बात कर रहे हैं और उसके साथ भक्ति भी भक्ति का उद्देश्य है कि प्रभु का अगर हम पास जाएंगे या सोमवार को या मंगलवार को हम प्रभु के आगे प्रार्थना करेंगे कामना की पूर्ति महाराज जी अगर उद्देश्य भगवत प्राप्ति हो |
हमें कमना की भी पूर्ति चाहिए तो हमको गलत आचरण छोड़ने पड़ेंगे क्योंकि हम जो कामना की पूर्ति चाहते हैं उसमें पाप आचरण बाधा पहुंचाएंगे |
तामसिक भोजन के नुकसान
पाप का फल दुख है पाप का फल विपत्ति है | पाप का फल संकट है यदि आप मुर्गा मुर्गी खाते हो तो पाप कर रहे हो और वो पाप आपकी कामनाओं को पूर्ण नहीं होने देगा चाहे हनुमान जी के पास जाओ चाहे राम जी के पास जाओ | जहां भी जाओगे जीवों की हिंसा करते हो जीवों को दुख देते हो गंदा आचरण करते हो गंदा भोजन पाते हो तो भगवान प्रसन्न नहीं होने वाले और आप किसी मंदिर ना जाओ घर में पवित्र आचरण करो पवित्र भोजन पाओ और नाम जप करो तुम्हारे घर में भगवान आ जाएंगे “कहो सु कहां जहां प्रभु नाहीं हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम से प्रकट होए “मैं जाना तो प्रेम कहां से आ जाएगा जब अपराध करोगे इसलिए सब जो कामना भी पूर्ति चाहते हैं तो उनको चाहिए कि गंदा भोजन और गंदे आचरणों का त्याग करें तो उनकी कामना जल्दी पूर्ण हो जाएगी निश्चित पूर्ण हो जाएगी | समझते हैं कि मतलब मुर्गा और मछली का अहिंसा करने से ये जीव हिंसा के अंतर्गत नहीं आता क्यों नहीं आता तुम्हारी अंगुली काटे तुम्हें कैसा लगेगा दर्द नहीं लगेगा | उन जीवों को देखो एक चींटी के भी पीछे अंगुली लगा के देखो ऐसे वो भाग रही है अपने प्राण रक्षा के लिए क्या उनमें जीव नहीं है क्या मुर्गा अपना प्राण बचाना नहीं चाहता | क्या पशु पक्षी प्राण बचाना नहीं चाहते ?और जिनको ये है कि अगर हम खाएंगे नहीं तो सृष्टि बढ़ जाएगी? तो तुम अपने बैलेंस की चिंता करो तुम्हारा बैलेंस जब परमात्मा बनाएगा तो तुम्हारे होश उड़ जाएंगे | वो परमात्मा का तीन कार्य है सृष्टि रचना सृष्टि पालन करना और सृष्टि का संहार करना वो भी अपने आप में ले कर लेता है | वो प्रलयकारी परमात्मा है वो काल का भी काल है | वो महाकाल है वो जब जिस समय जैसा चाहता है वैसा अपना कंट्रोल बैलेंस बनाता रहता है सृष्टि का बैलेंस बनाना उसका कार्य है | हमारा कार्य नहीं है हमारा कार्य है उसकी आज्ञा के अनुसार चलना हम मनुष्य हैं हम राक्षस नहीं हैं | तो हमें सबसे प्रार्थना है कि मांस मदिरा अंडा वराई स्त्री से बेविचार इनका त्याग करो | तो तुम्हारा जीवन सुखमय हो जाएगा |
निष्कर्ष
👉 सात्विक भोजन और संयमित आचरण ही मनुष्य जीवन को सार्थक बनाते हैं।
👉 तामसिक भोजन और पाप आचरण भगवान को कभी प्रसन्न नहीं कर सकते।
👉 यदि हम सुख, शांति और भगवत् कृपा चाहते हैं, तो हमें मांस, मदिरा, अंडा और व्यभिचार का त्याग करना होगा।
👉 याद रखें— “आहार और आचरण, दोनों का भगवान की भक्ति और जीवन की सफलता में गहरा संबंध है।” read more