बदलता भारत: रोटी, कपड़ा और मकान से ऑनलाइन शॉपिंग और इंस्टेंट नूडल्स तक( Consumer Economy)
कैसे बदली भारतीय उपभोक्ताओं की सोच और खरीदारी की आदतें
वर्ष 1974 में एक बड़ी सुपरहिट फिल्म आई थी जिसका नाम था “रोटी, कपड़ा और मकान”। देखिए, जो फिल्में होती हैं वो समाज का आईना होती हैं। समाज में जो कुछ चल रहा होता है, उसी पर फिल्में बनाई जाती हैं और फिल्मों के नाम भी उसी दौर की ज़रूरतों को दिखाते हैं। उस समय लोगों की बुनियादी ज़रूरत थी – रोटी, कपड़ा और मकान।
लेकिन 51 साल बाद, आज नए भारत के लोग रोटी की जगह इंस्टेंट नूडल्स खा रहे हैं, ऑनलाइन खाना मंगा कर खा रहे हैं। कपड़े अब लोकल दुकानों से नहीं बल्कि बड़े ब्रांडेड शोरूम्स और ऑनलाइन ऐप्स से खरीदे जाते हैं। और मकान? अब लोग घर लेने से पहले उसकी इंटीरियर डिज़ाइन और EMI विकल्पों तक पर ध्यान देते हैं।
शॉपिंग की बदलती आदतें
अब मेरा आपसे एक सवाल है – आपने आख़री बार महीने भर का सामान खरीदने की लंबी शॉपिंग लिस्ट कब बनाई थी? शायद बहुत समय हो गया होगा। पहले लोग महीने भर की लिस्ट बनाते थे और ज़रूरी सामान एक बार में खरीद लेते थे। लेकिन आज? लोग दिन में कई बार ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हैं।
आजकल लोगों की शॉपिंग लिस्ट में अनप्लान्ड शॉपिंग ज़्यादा है। गैर-ज़रूरी चीज़ें भी खरीद ली जाती हैं क्योंकि वो सस्ती मिल रही होती हैं या सोशल मीडिया पर आकर्षक लगती हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी को सिर्फ़ एक शर्ट चाहिए, तो अक्सर लोग दो-तीन शर्ट खरीद लेते हैं क्योंकि दूसरी पर डिस्काउंट चल रहा होता है।
सोचो मत, बस खरीद लो – नया ट्रेंड
आज का दौर है – “सोचो मत, बस खरीद लो”। अब लोग शॉपिंग करने से पहले घंटों सोचते नहीं, बल्कि मोबाइल पर स्क्रॉल करते हुए कोई प्रोडक्ट पसंद आता है तो तुरंत खरीद लेते हैं।
सोशल मीडिया पर रील्स, इन्फ्लुएंसर्स और विज्ञापन हमारी शॉपिंग आदतों को पूरी तरह बदल रहे हैं। हर ऑनलाइन शॉपिंग ऐप में लोगों की वॉचलिस्ट और कार्ट हमेशा भरे रहते हैं।
महानगर से गाँव तक फैला ऑनलाइन शॉपिंग का क्रेज
शुरुआत में ये ट्रेंड सिर्फ़ दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे महानगरों में था। लेकिन अब छोटे शहरों और गांवों तक ये लहर पहुँच चुकी है।
एक रिपोर्ट के अनुसार –
2020 में भारतीय लोग औसतन साल में 135 बार शॉपिंग करते थे।
2024 में यह बढ़कर 156 बार हो गया है।
यानि अब हर तीसरे दिन भारतीय लोग कुछ न कुछ शॉपिंग कर रहे हैं।
नई चीज़ों की बढ़ती खपत
गांवों में अब लोग फैब्रिक सॉफ़्टनर, ब्रांडेड स्नैक्स और ग्रीन टी तक इस्तेमाल करने लगे हैं।
इंस्टेंट नूडल्स की खपत पिछले 4 सालों में 21% बढ़ी।
पैक्ड स्नैक्स की खपत 25% बढ़ी।
इंस्टेंट कॉफी, फ्रोजन फूड्स और ओट्स की खपत भी तेजी से बढ़ रही है।
आज शहरों में जिन परिवारों की कमाई 40 लाख सालाना से ऊपर है, वहाँ ये ट्रेंड और भी तेज़ी से दिख रहा है।
आमदनी और खर्च का संतुलन
2014 में भारत में प्रति व्यक्ति सालाना आमदनी करीब ₹86,000 थी।
2023 तक यह बढ़कर ₹1,88,000 हो गई।
महंगाई दर अपेक्षाकृत कम बढ़ने के कारण अब लोगों के पास अधिक डिस्पोजेबल इनकम है और यही कारण है कि लोग पहले से ज़्यादा खर्च कर रहे हैं।
रीटेल थैरेपी और स्ट्रेस बस्टर के रूप में शॉपिंग
शॉपिंग को अब सिर्फ़ ज़रूरत नहीं, बल्कि मूड बदलने का तरीका भी माना जाने लगा है। इसे Retail Therapy कहा जाता है।
अगर कोई व्यक्ति तनाव में है, तो शॉपिंग उसे कुछ पल की खुशी दे देती है। इससे दिमाग़ में ऐसे हॉर्मोन रिलीज़ होते हैं जो मूड को बेहतर बनाते हैं। यही कारण है कि आज लाखों लोग ऑनलाइन शॉपिंग को टाइम पास और एंटरटेनमेंट की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारत: उपभोक्ताओं की अर्थव्यवस्था
पिछले दस सालों में भारत में हज़ारों नए स्वदेशी ब्रांड्स आए हैं।
खाने-पीने का सामान
इलेक्ट्रॉनिक्स
कॉस्मेटिक्स
इन क्षेत्रों में भारतीय ब्रांड्स ने विदेशी कंपनियों को भी कड़ी टक्कर दी है।
यानि आज भारत केवल एक विकासशील अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं द्वारा संचालित एक बड़ी मार्केट इकॉनमी बन चुका है।
निष्कर्ष
भारत का चेहरा बदल चुका है। रोटी, कपड़ा और मकान से आगे बढ़कर आज शॉपिंग लिस्ट में इंस्टेंट नूडल्स, फैब्रिक सॉफ़्टनर, ऑनलाइन फूड डिलीवरी और ग्रीन टी शामिल हो चुके हैं।
यह नया भारत है – जहाँ लोग ज्यादा कमा रहे हैं, ज्यादा खर्च कर रहे हैं और अपनी पसंद-नापसंद से एक नई कंज़्यूमर इकोनॉमी गढ़ रहे हैं।