AI की दौड़: ताकत, भविष्य और भारत की चुनौती
AI की दौड़ में India
की ताकत के मामले में पिछड़ रहे हैं, उनके लिए एक मशहूर फ्रेज का इस्तेमाल हम कर सकते हैं — अगर आप टेबल पर नहीं हैं, तो आप मेन्यू में हैं। आपको कोई आपसे बड़ी ताकत आकर खा जाएगी, या तो आप बातचीत की टेबल पर बैठिए।
और यही बात AI की रिसर्च पर लागू होती है। AI को लेकर दुनिया अब दो हिस्सों में बंट चुकी है। एक तरफ वो देश हैं, जो AI के सुपर पावर हैं, जिनके पास ताकत भी है, पैसा भी है, और वो AI के क्षेत्र में सबसे आगे निकल चुके हैं।
भारत, कनाडा और यूरोप के कई देश आज मिडल पावर्स हैं। उनके लिए AI की इस रेस में अमेरिका या चीन से मुकाबला करना आसान नहीं होगा। आज एडवांस AI मॉडल बनाने के लिए बहुत ज्यादा पैसा चाहिए, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए।
अगर कोई देश AI के क्षेत्र में पीछे रह गया, तो उसकी जरूरतें विदेशी कंपनियाँ ही पूरी करती रहेंगी। उनका डेटा और बाजार दूसरे देशों के हाथों में रहेगा और आर्थिक ताकत धीरे-धीरे शक्तिशाली देशों के हाथों में चली जाएगी। भारत अभी अपना बड़ा डिजिटल इकोसिस्टम बना रहा है।
साथ ही भारत एक बहुत बड़ा डिजिटल बाजार है, इसलिए भारत को आज AI के क्षेत्र में अगले दस वर्षों को ध्यान में रखकर निवेश और रिसर्च की एक बढ़िया रणनीति बनानी चाहिए, जो कि प्रधान मंत्री मोदी के नेतृत्व में हो भी रहा है।
AI क्रांति को मानव इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति कहा जाता है। इससे पहले इससे बड़ी क्रांति कभी नहीं हुई। ये पहली ऐसी क्रांति है जो सीधे-सीधे इंसानों को ही चुनौती दे रही है।
इंसानों का जो भविष्य है, वो खतरे में पड़ जाएगा — इतनी बड़ी क्रांति है।
पहली बार मशीनें सिर्फ हमारे हाथों का काम नहीं बल्कि इंसानों के दिमाग का काम भी करने लगी हैं।
AI पूरी दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव कर रहा है, जिसमें लोगों की सोचने-समझने की क्षमता से लेकर स्वास्थ्य और सुरक्षा तक सब कुछ शामिल है।
यानि ये सिर्फ एक टेक्नोलॉजी नहीं है, ये भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
इंसान जो काम करते थे अपने हाथों से, उस काम को तो पहले ही मशीनों ने छीन लिया है। सारा काम मशीनें करती हैं।
लेकिन इंसान अब तक अपने दिमाग से उन मशीनों को ऑपरेट करता था, और अब AI इंसान के उस दिमाग को भी छीन लेगा और अब ये मशीनें AI खुद ऑपरेट कर पाएगा।
आगे चलकर उसे उसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। इस समय दुनिया को दो हिस्सों में बांट कर देख सकते हैं आप। पहला डिजिटल आजादी और दूसरा डिजिटल गुलामी। जिन देशों के पास अपना AI है, अपना डेटा है, अपने सर्वर हैं —
वहीं देश भविष्य में स्वतंत्र रहेंगे। लेकिन जिन देशों के पास ये नहीं होगा और जो विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहेंगे, वो देश धीरे-धीरे डिजिटल गुलामी की तरफ बढ़ सकते हैं।
सत्रहवीं से उन्नीसवीं सदी के बीच ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को अपनी कॉलोनी बना लिया था, अपना गुलाम बना लिया था और भारत के तमाम संसाधनों पर कब्जा कर लिया था। आप सब जानते हैं जब ये हमारा गुलामी का दौर था।
अब 21वीं सदी में यही काम AI, Data और Algorithm के जरिए ये बड़ी-बड़ी कंपनियाँ कर सकती हैं।
अगर हम अभी सावधान नहीं हुए, तो दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियाँ भारत को एक डिजिटल कॉलोनी में बदलने की कोशिश करेंगी।
इसलिए आज भारत की सबसे बड़ी जरूरत है कि हम स्वदेशी AI क्रांति की रफ्तार को और तेज करें।
हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था।
दूसरा, 60 के दशक में हरित क्रांति — इसमें कृषि उत्पादन तेजी से बढ़ा और भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बना।
तीसरा, वर्ष 1970 में व्हाइट रिवोल्यूशन यानी श्वेत क्रांति — इसमें देश में दूध के उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि हुई और भारत इस मामले में दुनिया का नंबर एक देश बन गया।
ये तीन क्रांतियां हमारे देश की मोटा-मोटी आप मान सकते हैं।
कारगिल युद्ध के दौरान भारत को पाकिस्तानी सेना की सटीक GPS लोकेशन चाहिए थी और ये GPS डेटा सिर्फ अमेरिका के पास था, और अमेरिका ने ये डेटा हमें देने से इनकार कर दिया।
यानि संकट के समय उधार की टेक्नोलॉजी काम नहीं आती।
AI से पहले भारत दूसरी कई बड़ी क्रांतियों में पीछे रह चुका है।
वर्ष 1820 में दुनिया भर में औद्योगिक क्रांति आई थी।
ये इंग्लैंड से शुरू हुई और तब भारत अंग्रेजों का गुलाम था।
और ब्रिटेन ने मशीनों को भारत तक पहुँचने नहीं दिया।
1957 में अंतरिक्ष की क्रांति शुरू हुई, जब सोवियत संघ और अमेरिका ने अपने-अपने अंतरिक्ष यान और सैटेलाइट लॉन्च किए।
1970 के दशक में कंप्यूटर क्रांति का सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका और पश्चिमी देशों को मिला।
फिर 1990 के दशक में इंटरनेट क्रांति में भी भारत फिर से पीछे रह गया।
और भारत में वर्ष 2000 के बाद ही इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू हुआ।
और अगर आप प्रिसाइज़ली जाएं, तो 2014 के बाद भारत ने असल में डिजिटल क्रांति में शामिल होने की कोशिश की।
वर्ष 2004 से सोशल मीडिया क्रांति शुरू हुई, लेकिन भारत के लोग अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनियों के यूजर्स बनकर रह गए।